Friday, March 20, 2009

"अपने हाथों से यूं चहरे को छुपाते क्यूं हो"


अपने हाथों से यूं चहरे को छुपाते क्यूं हो,
मुझसे शरमाते हो तो सामने आते क्यूं हो,

तुम कभी मेरी तरह कर भी लो इकरार-ए-वफा,
प्यार करते हो तो फिर प्यार छुपाते क्यूं हो,

अश्क आखों में मेरी देख कर रोते क्यूं हो,
दिल भर आता है तो फिर दिल को दुखाते क्यूं हो,

रोज मर-मर के मुझे जीने को कहते क्यूं हो,
मिलने आते हो तो फिर लौट के जाते क्यूं हो,

अपने हाथों से यूं चहरे को छुपाते क्यूं हो,
मुझ से शरमाते हो तो सामने आते क्यूं हो...।

3 comments:

अनिल कान्त : said...

सचमुच दिल से लिखा है जैसे ....
मिलने आते हो तो फिर लौट के जाते क्यूं हो,


मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

दिगम्बर नासवा said...

रोज मर-मर के मुझे जीने को कहते क्यूं हो,
मिलने आते हो तो फिर लौट के जाते क्यूं हो,

वाह.......दिल से निकली हुए बात है........बहुत खूबसूरत लिखते हैं आप.

mehek said...

bahut khubsurat rachana.sunder bhav